"रवि"
*दूर नहीं हुं, दूर नहीं हुं
फिर आऊँगा कोहरे मे रहुंगा
थंड लगी तो याद करना
बादलो को दूर करूंगा
फिर आऊंगा...लाऊंगा
कभी तेज कभी प्यार भरा जीवन
फिर आऊँगा... लाऊंगा
भाल पे गाल पे
फिर सुबह कि लाली लाउंगा
दूर नही हुं...दूर नहीं हुं
फिर आउंगा*
दूर नहीं हुं, दूर नहीं हुं
(जाडे का या थंड का मौसम आया ही समझो !ओर फिर सुरज याने "रवि" क्या व्यक्त होता है पढिये !बस पंक्तिया है, गद्य है या पद्य ? उसे आप समझ लिजिए !)
© रविंद्र गांगल( Displayed at FB timeline 4th October 2019)